कविता-वक्त जिंदगी और सुकून

कभी कभी लगता है कि, वक्त को ठहरने के लिए कह दूँ . ..
सायद ज़िंदगी के कोटे में, खुशी के कुछ पल और जुड़ जाये।

ज़िंदगी के कोटे से कुछ पल उधार मांग रहा हूँ,
दो पल के सुकुन की तलाश मांग रहा हूँ ,
ना जाने किस मोड़ पर ले जाये ये जिंदगी ,
बस बची हुई ज़िंदगी से थोड़ी मुस्कान मांग रहा हूँ।

चलो, आज फिर से वक्त का एक कदम आगे बढ़ा,
सफर ज़िन्दीगी का हैं या मौत का … ये किसको कहा पता चला।

चलते चलते पाँव थक से जाते हैं
सुकुन सा मिल जाता है जब बात कर आते हैं,
रास्ते तब ख़त्म हो जाते हैं,
जब पाँव नहीं दिल थक जाते हैं ,
ऐस समां नहिं की जहाँ सुबह और शाम नहीं होती हैं,
कुछ खालीपन सा लगता हैं जब तक किसी अपने से बात नहीं होती हैं ।