पहली बार-कविता

आज सुबह को मैं बाग मे गया,
वहाँ कि ताजगी देख कर कुछ देर तो वही रुका,
मंन जेसे हरा भरा हुआ, दिल को यही लगने लगा,
जब मै तनहा हु तब यही पर रहू!

दूर कही नजर पड़ी
खिला एक फूल दिखा
फूल देख मानो जेसे नया जीवन खिला
मै फूल पाने के लिए आगे बड़ा !
किसी दूसरे के हाथ ना लग जाये ये डर लगने लगा !
आज फूल को पाना है जा कर उन्हें दिखाना है
इस फूल को पाकर ना आये ख़याल मुरझाने का
आखो के सामने रख कर जी कर जाये नया कुछ कर जाने का
दुरी अब ख़त्म हुई , फूल पाने कि देरी हुई !
जब मैं फूल के सामने आया ये तो एक फूल कि कली हुई !
मै तो समझा था मैं जी लिया अपनी आधी ज़िन्दगी
लेकिन कली को देख कर ऐसा लागने लगा !
कि मै आया था , बाग मै पहली बार
और मिल गया मुझे ज़िन्दगी का सूत्राधार!


संदीप गुप्ता

Sandeep Gupta
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