आज की अबला

निज स्वार्थ को भी समझ सके न जो नारी,
कैसे कह दु उसको मैं , की वह अबला बेचारी।

वह पुरुष जो प्रिय समझ कर हाथ थामा था,
कर समपर्ण प्रेम का निज हिय से बांधा था,
रख सके वह खुश उसे यह चाह जिसकी थी,
कण्ठ थे उसके मगर , हर राग उसकी थी
जो भावनाओ से इतर, हो बह रही
कैसे कह दु उसको मैं की वह अबला बेचारी ।

जो सम्बन्धो के अनुबन्धों की मर्यादा तक को भूल गयी,
जो पुरुष, प्रेम का चेतन है, उस चितरंजन को भूल गई
जो भूल गई उस वसुधा को जिस पर पांव रखे वह चलती थी,
जो भूल गई उस ममता को जो बिन मांगे ही मिलती थी,
कवि आंख मिलाए कैसे उससे यह है उसकी लाचारी
कैसे कह दु उसको मैं की वह अबला बेचारी ।

जिन सम्बन्धो की तुरपाई में युग युग बीता जाता है,
जिन सम्बन्धों की अगुवाई में युद्धों को जीता जाता है,
उन सम्बन्धो को लगा दांव पर जो रणनीति बना बैठी,
जो पग चिन्ह मिले थे चलने को, उसको धूल चटा बैठी,
अब दर दर रोना है उसको, अब उसके रोने कीै बारी,
कैसे कह दु उसको मै की वह अबला बेचारी ।

प्रशान्त श्रीवास्तव
एडवोकेट

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